गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही
चौपाई ३, दोहा १८४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही॥ सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥ ३ ॥
अर्थ
[वह सोचने लगी कि] पर्वतों, नदियों और समुद्रों का बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही (दूसरों का अनिष्ट करनेवाला) लगता है। पृथ्वी सारे धर्मों को विपरीत देख रही है, पर रावण से भयभीत हुई वह कुछ बोल नहीं सकती।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण, कुंभकर्ण आदि के जन्म, तपस्या से प्राप्त ऐश्वर्य और तीनों लोकों पर अत्याचार का वर्णन है।
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रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार