सुख संपति सुत सेन सहाई

चौपाई १, दोहा १८० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥ नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥ १ ॥

अर्थ

सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई—ये सब उसके नित्य नये [वैसे ही] बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण, कुंभकर्ण आदि के जन्म, तपस्या से प्राप्त ऐश्वर्य और तीनों लोकों पर अत्याचार का वर्णन है।

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रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार