खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि
दोहा १७८ (क) · बालकाण्ड
दोहा पाठ
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव। कनक कोट मनिखचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥ १७८ (क) ॥
अर्थ
उसे चारों ओर से समुद्र की अत्यन्त गहरी खाई घेरे हुए है। उस [दुर्ग] के मणियों से जड़ा हुआ सोने का मजबूत परकोटा है, जिसकी कारीगरी का वर्णन नहीं किया जा सकता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार” प्रकरण का दोहा १७८ (क) है। इस प्रकरण में रावण, कुंभकर्ण आदि के जन्म, तपस्या से प्राप्त ऐश्वर्य और तीनों लोकों पर अत्याचार का वर्णन है।
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रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार