धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी
चौपाई ४, दोहा १८४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥ निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई॥ ४ ॥
अर्थ
[अन्त में] हृदय में सोच-विचारकर, गौ का रूप धारण कर धरती वहाँ गयी, जहाँ सब देवता और मुनि [छिपे] थे। पृथ्वी ने रोकर उनको अपना दुःख सुनाया, पर किसी से कुछ काम न बना।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण, कुंभकर्ण आदि के जन्म, तपस्या से प्राप्त ऐश्वर्य और तीनों लोकों पर अत्याचार का वर्णन है।
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रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार