गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी
चौपाई ३, दोहा १७८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥ सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा॥ ३ ॥
अर्थ
समुद्र के बीच में त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। [महान् मायावी और निपुण कारीगर] मय दानव ने उसे फिर से सजा दिया। उसमें मणियों से जड़े हुए सोने के अनगिनत महल थे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १७८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण, कुंभकर्ण आदि के जन्म, तपस्या से प्राप्त ऐश्वर्य और तीनों लोकों पर अत्याचार का वर्णन है।
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रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार