सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई

चौपाई ४, दोहा १८३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥ नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना॥ ४ ॥

अर्थ

[उनके डर से] कहीं भी शुभ आचरण नहीं होते थे। देवता, ब्राह्मण और गुरु को कोई नहीं मानता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था। वेद और पुराण तो सपने में भी सुनने को नहीं मिलते थे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण, कुंभकर्ण आदि के जन्म, तपस्या से प्राप्त ऐश्वर्य और तीनों लोकों पर अत्याचार का वर्णन है।

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रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार