सुत समूह जन परिजन नाती
सुत समूह जन परिजन नाती
चौपाई २, दोहा १८१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥ सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥ २ ॥
अर्थ
पुत्र-पौत्र, कुटुम्बी और सेवक ढेर-के-ढेर थे। [सारी] राक्षसों की जातियों को तो गिन ही कौन सकता था? अपनी सेना को देखकर स्वभाव से ही अभिमानी रावण क्रोध और गर्व में सनी हुई वाणी बोला—।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रावण, कुंभकर्ण आदि के जन्म, तपस्या से प्राप्त ऐश्वर्य और तीनों लोकों पर अत्याचार का वर्णन है।
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रावण का जन्म, ऐश्वर्य और अत्याचार