सुतीक्ष्णजी का प्रेम, अगस्त्य मिलन, अगस्त्य संवाद, राम का दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन
सुतीक्ष्ण मुनि प्रेमविभोर होकर श्रीराम की सेवा करते हैं। आगे चलकर प्रभु अगस्त्य मुनि से मिलते हैं, उनके साथ धर्ममय संवाद होता है, फिर दंडक वन में प्रवेश कर जटायु से स्नेहपूर्ण भेंट होती है।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण ७ / १८
प्रकरण पाठ
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥ मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥ १ ॥
अर्थ:
मुनि अगस्त्यजी के एक सुतीछन नामक सुजान (ज्ञानी) शिष्य थे, उनको भगवान् में प्रीति थी। वे मन, वचन और कर्म से श्रीरामजी के चरणों के सेवक थे। उन्हें स्वप्न में भी किसी दूसरे देवता का भरोसा नहीं था।
सहित अनुज मोहि राम गोसाईं। मिलिहहिं निज सेवक की नाईं॥ मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
क्या स्वामी श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित मुझसे अपने सेवक की तरह मिलेंगे? मेरे हृदय में दृढ़ विश्वास नहीं होता; क्योंकि मेरे मन में भक्ति, वैराग्य या ज्ञान कुछ भी नहीं है।
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥ एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥ ४ ॥
अर्थ:
मैंने न तो सत्संग, योग, जप अथवा यज्ञ ही किये हैं और न प्रभु के चरणकमलों में मेरा दृढ़ अनुराग ही है। हाँ, दया के भंडार प्रभु की एक बानी है कि जिसे किसी दूसरे का सहारा नहीं है, वह उन्हें प्रिय होता है।
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन॥ निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥ ५ ॥
अर्थ:
[ भगवान् की इस बानी का स्मरण आते ही मुनि आनन्दमग्न होकर मन ही मन कहने लगे--] अहा! भवबंधन से छुड़ानेवाले प्रभु के मुखारविन्द को देखकर आज मेरे नेत्र सफल होंगे। [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! ज्ञानी मुनि प्रेम में पूर्ण रूप से निमग्न हैं। उनकी वह दशा कही नहीं जा सकती।
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा॥ कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई॥ ६ ॥
अर्थ:
उन्हें दिशा-विदिशा (दिशाएँ और उनके कोण आदि) और रास्ता, कुछ भी नहीं सूझ रहा है। मैं कौन हूँ और कहाँ जा रहा हूँ, यह भी नहीं जानते (इसका भी ज्ञान नहीं है)। वे कभी पीछे घूमकर फिर आगे चलने लगते हैं और कभी [प्रभु के] गुण गा-गाकर नाचने लगते हैं।
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई॥ अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा॥ ७ ॥
अर्थ:
मुनि ने प्रगाढ़ प्रेमाभक्ति प्राप्त कर ली। प्रभु श्रीरामजी वृक्ष की ओट में छिपकर [भक्त की प्रेमोन्मत्त दशा] देख रहे हैं। मुनि का अत्यन्त प्रेम देखकर भव-भय (आवागमन के भय) को हरनेवाले श्रीरघुनाथजी मुनि के हृदय में प्रकट हो गये।
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा॥ तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए॥ ८ ॥
अर्थ:
[हृदय में प्रभु के दर्शन पाकर] मुनि बीच रास्ते में अचल होकर बैठ गये। उनका शरीर रोमांच से कटहल के फल के समान [कण्टकित] हो गया। तब श्रीरघुनाथजी उनके पास चले आये और अपने भक्त की प्रेमदशा देखकर मन में बहुत प्रसन्न हुए।
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यान जनित सुख पावा॥ भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा॥ ९ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी ने मुनि को बहुत प्रकार से जगाया, पर मुनि नहीं जागे; क्योंकि उन्हें प्रभु के ध्यान का सुख प्राप्त हो रहा था। तब श्रीरामजी ने अपना राजरूप छिपा लिया और उनके हृदय में अपना चतुर्भुजरूप प्रकट किया।
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनिबर जैसें॥ आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा॥ १० ॥
अर्थ:
तब (अपने इष्ट-स्वरूप के अन्तर्धान होते ही) मुनि कैसे व्याकुल होकर उठे, जैसे श्रेष्ठ (मणिधर) सर्प मणि के बिना व्याकुल हो जाता है। मुनि ने अपने सामने सीताजी और लक्ष्मणजी सहित श्यामसुन्दर-विग्रह सुखधाम श्रीरामजी को देखा।
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला॥ राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा॥ १२ ॥
अर्थ:
कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुनिसे मिलते हुए ऐसे शोभित हो रहे हैं, मानो सोने के वृक्ष से तमाल का वृक्ष गले लगकर मिल रहा हो। मुनि [निस्तब्ध] खड़े हुए [टकटकी लगाकर] श्रीरामजी का मुख देख रहे हैं, मानो चित्र में लिखकर बनाये गये हों।
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं॥ पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं॥ २ ॥
अर्थ:
हे नीलकमल की माला के समान श्याम शरीरवाले! हे जटाओं का मुकुट और मुनियों के (वल्कल) वस्त्र पहने हुए, हाथों में धनुष-बाण लिये तथा कमर में तरकस कसे हुए श्रीरामजी! मैं आपको निरन्तर नमस्कार करता हूँ।
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः॥ निसिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः॥ ३ ॥
अर्थ:
जो मोहरूपी घने वन को जलाने के लिये अग्नि हैं, संतरूपी कमलों के वन को प्रफुल्लित करने के लिये सूर्य हैं, राक्षसरूपी हाथियों के समूह के पछाड़ने के लिये सिंह हैं और भव (आवागमन) रूपी पक्षी के मारने के लिये बाज रूप हैं, वे प्रभु सदा हमारी रक्षा करें।
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः॥ भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः॥ ५ ॥
अर्थ:
जो संशयरूपी सर्प को ग्रसने के लिये गरुड़ हैं, अत्यन्त कठोर तर्क से उत्पन्न होनेवाले विषाद का नाश करनेवाले हैं, आवागमन को मिटानेवाले और देवताओं के समूह को आनन्द देनेवाले हैं, वे कृपा के वरूथ श्रीरामजी सदा हमारी रक्षा करें।
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः॥ अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः॥ ७ ॥
अर्थ:
जो भक्तों के लिये कल्पवृक्ष के बगीचे हैं, क्रोध, लोभ, मद और काम को डरानेवाले हैं, अत्यन्त ही चतुर और संसार रूपी समुद्र से तरने के लिये सेतु रूप हैं, वे सूर्यकुल की ध्वजा श्रीरामजी सदा मेरी रक्षा करें।
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः॥ धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः॥ ८ ॥
अर्थ:
जिनकी भुजाओं का प्रताप अतुलनीय है, जो बल के धाम हैं, जिनका नाम कलियुग के बड़े भारी पापों का नाश करनेवाला है, जो धर्म के कवच (रक्षक) हैं और जिनके गुणसमूह आनन्द देनेवाले हैं, वे श्रीरामजी निरन्तर मेरे कल्याण का विस्तार करें।
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी॥ तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी॥ ९ ॥
अर्थ:
यद्यपि आप निर्मल, व्यापक, अविनाशी और सब के हृदय में निरन्तर निवास करनेवाले हैं; तथापि हे खरारि श्रीरामजी! लक्ष्मणजी और सीताजी सहित वन में विचरनेवाले आप इसी रूप में मेरे हृदय में निवास कीजिये।
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥ सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए॥ ११ ॥
अर्थ:
ऐसा अभिमान भूलकर भी न छूटे कि मैं सेवक हूँ और श्रीरघुनाथजी मेरे स्वामी हैं। मुनि के वचन सुनकर श्रीरामजी मन में बहुत प्रसन्न हुए। तब उन्होंने हर्षित होकर श्रेष्ठ मुनि को हृदय से लगा लिया।
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउँ सो तोही॥ मुनि कह मैं बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा॥ १२ ॥
अर्थ:
[और कहा—] हे मुनि! मुझे परम प्रसन्न जानो। जो वर माँगो, वही मैं तुम्हें दूँ! मुनि सुतीक्ष्णजी ने कहा—मैंने तो वर कभी माँगा ही नहीं। मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ है और क्या सत्य है, (क्या माँगूँ, क्या नहीं)।
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई॥ अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना॥ १३ ॥
अर्थ:
[अतः] हे रघुनाथजी! हे दासों को सुख देनेवाले! आपको जो अच्छा लगे, मुझे वही दीजिये। [श्रीरामचन्द्रजी ने कहा—हे मुने!] तुम प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, विज्ञान और समस्त गुणों तथा ज्ञान के निधान हो जाओ।
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुंभज रिषि पासा॥ बहुत दिवस गुर दरसनु पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ॥ १ ॥
अर्थ:
“एवमस्तु' (ऐसा ही हो) ऐसा उच्चारण कर लक्ष्मीनिवास श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर अगस्त्य ऋषि के पास चले। [तब सुतीक्ष्णजी बोले—] गुरु अगस्त्यजी का दर्शन पाए और इस आश्रम में आए हुए मुझे बहुत दिन हो गये।
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं॥ देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसे द्वौ भाई॥ २ ॥
अर्थ:
अब मैं भी प्रभु (आप) के साथ गुरुजी के पास चलता हूँ। इसमें हे नाथ! आप पर मेरा कोई एहसान नहीं है। मुनि की चतुरता देखकर कृपा के भण्डार श्रीरामजी ने उन्हें संग ले लिया और दोनों भाई हँसने लगे।
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा॥ तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
रास्ते में अपनी अनुपम भक्ति का वर्णन करते हुए देवताओं के राजराजेश्वर श्रीरामजी अगस्त्य मुनि के आश्रम पर पहुँचे। सुतीक्ष्ण तुरंत ही गुरु अगस्त्यजी के पास गये और दण्डवत् करके ऐसा कहने लगे—।
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए॥ मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई॥ ५ ॥
अर्थ:
यह सुनते ही अगस्त्यजी तुरंत ही उठ दौड़े। भगवान् को देखते ही उनके नेत्रों में [आनन्द और प्रेम के आँसुओं का] जल भर आया। दोनों भाई मुनि के चरणकमलों पर गिर पड़े। ऋषि ने [उठाकर] बड़े प्रेम से उन्हें हृदय से लगा लिया।
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर। सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर॥ १२ ॥
अर्थ:
मुनियों के समूह में श्रीरामचन्द्रजी सबकी ओर सम्मुख होकर बैठे हैं (अर्थात् प्रत्येक मुनि को श्रीरामजी अपने ही सामने मुख करके बैठे दिखायी देते हैं और सब मुनि टकटकी लगाये उनके मुख को देख रहे हैं)। ऐसा जान पड़ता है मानो चकोरों का समुदाय शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा की ओर देख रहा हो।
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही॥ मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी॥ २ ॥
अर्थ:
हे प्रभो! अब आप मुझे वही मन्त्र (सलाह) दीजिये, जिस प्रकार मैं मुनियों के द्रोही राक्षसों को मारूँ। प्रभु की वाणी सुनकर मुनि मुस्कराये और बोले-हे नाथ! आपने क्या समझकर मुझसे यह प्रश्न किया है?
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी॥ ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया॥ ३ ॥
अर्थ:
हे पापों का नाश करनेवाले! मैं तो आप ही के भजन के प्रभाव से आपकी कुछ थोड़ी-सी महिमा जानता हूँ। आपकी माया गूलर के विशाल वृक्ष के समान है, अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह ही जिसके फल हैं।
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना॥ ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला॥ ४ ॥
अर्थ:
चर और अचर जीव [गूलर के फल के भीतर रहनेवाले छोटे-छोटे] जन्तुओं के समान उनके भीतर बसते हैं और वे [अपने उस छोटे-से जगत् के सिवा] दूसरा कुछ नहीं जानते। उन फलों का भक्षण करनेवाला कठिन और कराल काल है। वह काल भी सदा आपसे भयभीत रहता है।
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं॥ यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता॥ ५ ॥
अर्थ:
उन्हीं आप ने समस्त लोकपतियों के स्वामी होकर भी मुझसे मनुष्य की तरह प्रश्न किया। हे कृपा के धाम! मैं तो यह वर माँगता हूँ कि आप श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित मेरे हृदय में [सदा] निवास कीजिये।
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥ संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥ ७ ॥
अर्थ:
यद्यपि मैं आपके ऐसे रूप को जानता हूँ और उसका वर्णन भी करता हूँ तो भी लौट-लौटकर मैं सगुण ब्रह्म में (आपके इस सुन्दर स्वरूप में) ही प्रेम मानता हूँ। आप सेवकों को सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसी से हे रघुराई! आपने मुझसे पूछा है।