जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी
चौपाई १०, दोहा ११ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी॥ जो कोसलपति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना॥ १० ॥
अर्थ
हे स्वामी! आपको जो सगुण, निर्गुण और अन्तर्यामी जानते हों, वे जानें; मेरे हृदय को तो कोसलपति कमलनयन श्रीरामजी ही अपना घर बनावें।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई १०, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।
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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन