मोह विपिन घन दहन कृशानुः
मोह विपिन घन दहन कृशानुः
चौपाई ३, दोहा ११ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः॥ निसिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः॥ ३ ॥
अर्थ
जो मोहरूपी घने वन को जलाने के लिये अग्नि हैं, संतरूपी कमलों के वन को प्रफुल्लित करने के लिये सूर्य हैं, राक्षसरूपी हाथियों के समूह के पछाड़ने के लिये सिंह हैं और भव (आवागमन) रूपी पक्षी के मारने के लिये बाज रूप हैं, वे प्रभु सदा हमारी रक्षा करें।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।
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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन