होइहैं सुफल आजु मम लोचन
होइहैं सुफल आजु मम लोचन
चौपाई ५, दोहा १० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन॥ निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥ ५ ॥
अर्थ
[ भगवान् की इस बानी का स्मरण आते ही मुनि आनन्दमग्न होकर मन ही मन कहने लगे--] अहा! भवबंधन से छुड़ानेवाले प्रभु के मुखारविन्द को देखकर आज मेरे नेत्र सफल होंगे। [शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! ज्ञानी मुनि प्रेम में पूर्ण रूप से निमग्न हैं। उनकी वह दशा कही नहीं जा सकती।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।
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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन