राक्षस वध की प्रतिज्ञा करना
वन में ऋषियों की अस्थियाँ और उन पर हुए अत्याचार देखकर श्रीराम करुणा और धर्मयुक्त क्रोध से भर उठते हैं। वे राक्षसों का विनाश कर मुनियों की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करते हैं।
अरण्यकाण्ड · प्रकरण ६ / १८
प्रकरण पाठ
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥ ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥ १ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर शरभंगजी ने योगाग्नि से अपने शरीर को जला डाला और श्रीरामजी की कृपा से वे वैकुण्ठ को चले गये। मुनि भगवान् में लीन इसलिये नहीं हुए कि उन्होंने पहले ही भेद-भक्ति का वर ले लिया था।
रिषि निकाय मुनिबर गति देखी। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी॥ अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा॥ २ ॥
अर्थ:
ऋषिसमूह मुनिश्रेष्ठ शरभंगजी की यह [दुर्लभ] गति देखकर अपने हृदय में विशेषरूप से सुखी हुए। समस्त मुनिवृन्द श्रीरामजी की स्तुति कर रहे हैं [और कह रहे हैं] शरणागतहितकारी करुणाकन्द (करुणा के मूल) प्रभु की जय हो!।
जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥ ४ ॥
अर्थ:
[मुनियों ने कहा--] हे स्वामी! आप सर्वदर्शी (सर्वज्ञ) और अन्तर्यामी (सबके हृदय की जाननेवाले) हैं। जानते हुए भी [अनजान की तरह] हमसे कैसे पूछ रहे हैं ? राक्षसों के दल ने सब मुनियों को खा डाला है [ये सब उन्हीं की हड्डियों के ढेर हैं]। यह सुनते ही श्रीरघुवीर के नेत्रों में जल छा गया (उनकी आँखों में करुणा के आँसू भर आये)।