जीव चराचर जंतु समाना

चौपाई ४, दोहा १३ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना॥ ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला॥ ४ ॥

अर्थ

चर और अचर जीव [गूलर के फल के भीतर रहनेवाले छोटे-छोटे] जन्तुओं के समान उनके भीतर बसते हैं और वे [अपने उस छोटे-से जगत् के सिवा] दूसरा कुछ नहीं जानते। उन फलों का भक्षण करनेवाला कठिन और कराल काल है। वह काल भी सदा आपसे भयभीत रहता है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।

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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन