सहित अनुज मोहि राम गोसाईं
सहित अनुज मोहि राम गोसाईं
चौपाई ३, दोहा १० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
सहित अनुज मोहि राम गोसाईं। मिलिहहिं निज सेवक की नाईं॥ मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥ ३ ॥
अर्थ
क्या स्वामी श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित मुझसे अपने सेवक की तरह मिलेंगे? मेरे हृदय में दृढ़ विश्वास नहीं होता; क्योंकि मेरे मन में भक्ति, वैराग्य या ज्ञान कुछ भी नहीं है।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।
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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन