प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा

चौपाई २, दोहा १० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा॥ हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया॥ २ ॥

अर्थ

उन्होंने जैसे ही प्रभु का आगमन कानों से सुन पाया, त्यों ही अनेक प्रकार के मनोरथ करते हुए वे आतुरता से दौड़ चले। हे विधाता! क्या दीनबन्धु श्रीरघुनाथजी मुझ-जैसे दुष्ट पर भी दया करेंगे?

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन