नहिं सतसंग जोग जप जागा

चौपाई ४, दोहा १० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥ एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥ ४ ॥

अर्थ

मैंने न तो सत्संग, योग, जप अथवा यज्ञ ही किये हैं और न प्रभु के चरणकमलों में मेरा दृढ़ अनुराग ही है। हाँ, दया के भंडार प्रभु की एक बानी है कि जिसे किसी दूसरे का सहारा नहीं है, वह उन्हें प्रिय होता है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन