अस तव रूप बखानउँ जानउँ

चौपाई ७, दोहा १३ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ॥ संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई॥ ७ ॥

अर्थ

यद्यपि मैं आपके ऐसे रूप को जानता हूँ और उसका वर्णन भी करता हूँ तो भी लौट-लौटकर मैं सगुण ब्रह्म में (आपके इस सुन्दर स्वरूप में) ही प्रेम मानता हूँ। आप सेवकों को सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसी से हे रघुराई! आपने मुझसे पूछा है।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा १३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।

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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन