मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना
चौपाई १, दोहा १० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥ मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक॥ १ ॥
अर्थ
मुनि अगस्त्यजी के एक सुतीछन नामक सुजान (ज्ञानी) शिष्य थे, उनको भगवान् में प्रीति थी। वे मन, वचन और कर्म से श्रीरामजी के चरणों के सेवक थे। उन्हें स्वप्न में भी किसी दूसरे देवता का भरोसा नहीं था।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।
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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन