जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी
चौपाई ९, दोहा ११ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी॥ तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी॥ ९ ॥
अर्थ
यद्यपि आप निर्मल, व्यापक, अविनाशी और सब के हृदय में निरन्तर निवास करनेवाले हैं; तथापि हे खरारि श्रीरामजी! लक्ष्मणजी और सीताजी सहित वन में विचरनेवाले आप इसी रूप में मेरे हृदय में निवास कीजिये।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ९, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।
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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन