पंचवटी निवास और श्रीराम-लक्ष्मण संवाद

श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मणजी पंचवटी में निवास स्थापित करते हैं। वहाँ श्रीराम लक्ष्मणजी को ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति का गूढ़ उपदेश देते हैं।

अरण्यकाण्ड · प्रकरण ८ / १८

प्रकरण पाठ

चौपाई

जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥ गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥ १ ॥

अर्थ:

जबसे श्रीरामजी ने वहाँ निवास किया तबसे मुनि सुखी हो गये, उनका डर जाता रहा। पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभा से छा गये। वे दिनोंदिन अधिक सुहावने (मालूम) होने लगे।

चौपाई

खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं॥ सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा॥ २ ॥

अर्थ:

पक्षी और पशुओं के समूह आनन्दित रहते हैं और भौंरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं। जहाँ प्रत्यक्ष श्रीरामजी विराजमान हैं, उस वन का वर्णन सर्पराज शेषजी भी नहीं कर सकते।

चौपाई

एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥ सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥ ३ ॥

अर्थ:

एक बार प्रभु श्रीरामजी सुख से बैठे हुए थे। उस समय लक्ष्मणजी ने छलरहित (सरल) वचन कहे-हे देवता, मनुष्य, मुनि और चराचर के स्वामी! मैं अपने प्रभु की तरह (अपना स्वामी समझकर) आपसे पूछता हूँ।

चौपाई

मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥ कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥ ४ ॥

अर्थ:

हे देव! मुझे समझाकर वही कहिये, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की ही सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिये; और उस भक्ति को कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं।

दोहा

ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ॥ जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥ १४ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिये, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जायँ।

दोहा 15 के अंतर्गत
चौपाई

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥ मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥ १ ॥

अर्थ:

थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। हे तात! तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो। मैं और मेरा, तू और तेरा--यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है।

चौपाई

गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥ तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥ २ ॥

अर्थ:

इन्द्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उस सब को माया जानना। उसके भी--एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो--।

चौपाई

एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥ एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥ ३ ॥

अर्थ:

एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यन्त दुःखरूप है, जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँ में पड़ा हुआ है। और एक (विद्या) जिसके वश में गुण है और जो जगत् की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसके अपने बल का कुछ भी नहीं है।

चौपाई

ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥ कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥ ४ ॥

अर्थ:

ज्ञान वह है जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी [दोष] नहीं है और जो सब में समान रूप से ब्रह्म को देखता है। हे तात! उसी को परम बैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो।

दोहा

माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥ १५ ॥

अर्थ:

जो मायाको, ईश को और अपने आपको नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये। जो [कर्मानुसार] बन्धन और मोक्ष देनेवाला, सबसे परे और मायाका प्रेरक है वह शिव है।

दोहा 16 के अंतर्गत
चौपाई

धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥ जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥ १ ॥

अर्थ:

धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देनेवाला है--ऐसा वेदों ने वर्णन किया है। और हे भाई ! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देनेवाली है।

चौपाई

सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥ भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥ २ ॥

अर्थ:

वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसको (ज्ञान-विज्ञान आदि किसी) दूसरे साधन का सहारा (अपेक्षा) नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल (प्रसन्न) होते हैं।

चौपाई

भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥ प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥ ३ ॥

अर्थ:

अब मैं भक्ति के साधन विस्तार से कहता हूँ--यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणों के चरणों में अत्यन्त प्रीति हो और वेद की रीति के अनुसार अपने-अपने [वर्णाश्रम के] कर्मों में लगा रहे।

चौपाई

एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥ श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

इसका फल, फिर विषयों से वैराग्य होगा। तब (वैराग्य होने पर) मेरे धर्म (भागवतधर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मन में मेरी लीलाओं के प्रति अत्यन्त प्रेम होगा।

चौपाई

संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥ गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥ ५ ॥

अर्थ:

जिसका संतों के चरणकमलों में अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो;।

चौपाई

मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥ काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥ ६ ॥

अर्थ:

मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गदगद हो जाय और नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई ! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ।

दोहा

बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम। तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥ १६ ॥

अर्थ:

जिनको कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है; और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय-कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ।

दोहा 17 के अंतर्गत
चौपाई

भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥ एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥ १ ॥

अर्थ:

इस भक्तियोग को सुनकर लक्ष्मणजी ने अत्यन्त सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाया। इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गये।

चौपाई

सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी॥ पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा॥ २ ॥

अर्थ:

शूर्पणखा नामक रावण की एक बहिन थी, जो नागिन के समान भयानक और दुष्ट हृदय की थी। वह एक बार पंचवटी में गयी और दोनों राजकुमारों को देखकर विकल (काम से पीड़ित) हो गयी।

चौपाई

भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥ होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी॥ ३ ॥

अर्थ:

(काकभुशुण्डिजी कहते हैं--) हे गरुड़जी! (शूर्पणखा-जैसी राक्षसी, धर्मज्ञानशून्य कामान्ध) स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मन को नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्य को देखकर द्रवित हो जाती है (ज्वाला से पिघल जाती है)।

चौपाई

रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी॥ ४ ॥

अर्थ:

वह सुन्दर रूप धरकर प्रभु के पास जाकर और बहुत मुसकराकर वचन बोली--न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री ! विधाता ने यह संयोग (जोड़ा) बहुत विचारकर रचा है।

चौपाई

मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं॥ तातें अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी॥ ५ ॥

अर्थ:

मेरे योग्य पुरुष (वर) जगत् भर में नहीं है, मैंने तीनों लोकों को खोज देखा। इसीसे मैं अब तक कुमारी (अविवाहित) रही। अब तुम को देखकर कुछ मन माना (चित्त ठहरा) है।

चौपाई

सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता॥ गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी॥ ६ ॥

अर्थ:

सीताजी की ओर देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है। तब वह लक्ष्मणजी के पास गयी। लक्ष्मणजी उसे शत्रु की बहिन समझकर और प्रभु की ओर देखकर कोमल वाणी से बोले--।

चौपाई

सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा॥ प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा॥ ७ ॥

अर्थ:

हे सुन्दरी! सुन, मैं तो उनका दास हूँ। मैं पराधीन हूँ, अतः तुम्हें सुभीता (सुख) न होगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुर के राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फबता है।

चौपाई

सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥ लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी॥ ८ ॥

अर्थ:

सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी (जिसे जूए, शराब आदि का व्यसन हो) धन और व्यभिचारी शुभ गति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल--अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाश को दुहकर दूध लेना चाहते हैं (अर्थात्‌ असम्भव बात को सम्भव करना चाहते हैं)।

चौपाई

पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई॥ लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई॥ ९ ॥

अर्थ:

वह लौटकर फिर श्रीरामजी के पास आयी। प्रभु ने फिर उसे लक्ष्मणजी के पास भेज दिया। लक्ष्मणजी ने कहा--तुम्हें वही बरेगा जो तृण तोड़कर लज्जा परिहरई (अर्थात्‌ जो निपट निर्लज्ज होगा)।

चौपाई

तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई॥ सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई॥ १० ॥

अर्थ:

तब वह खिसियायी हुई (क्रुद्ध होकर) श्रीरामजी के पास गयी और उसने अपना भयंकर रूप प्रकट किया। सीताजी को भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मणजी को इशारा देकर कहा।

दोहा

लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि। ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि॥ १७ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी ने बड़ी फुर्ती से उसको बिना नाक-कान की कर दिया। मानो उसके हाथ रावण को चुनौती दी हो!।