अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई

चौपाई ७, दोहा १० के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई॥ अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा॥ ७ ॥

अर्थ

मुनि ने प्रगाढ़ प्रेमाभक्ति प्राप्त कर ली। प्रभु श्रीरामजी वृक्ष की ओट में छिपकर [भक्त की प्रेमोन्मत्त दशा] देख रहे हैं। मुनि का अत्यन्त प्रेम देखकर भव-भय (आवागमन के भय) को हरनेवाले श्रीरघुनाथजी मुनि के हृदय में प्रकट हो गये।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।

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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन