भक्त कल्पपादप आरामः

चौपाई ७, दोहा ११ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः॥ अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः॥ ७ ॥

अर्थ

जो भक्तों के लिये कल्पवृक्ष के बगीचे हैं, क्रोध, लोभ, मद और काम को डरानेवाले हैं, अत्यन्त ही चतुर और संसार रूपी समुद्र से तरने के लिये सेतु रूप हैं, वे सूर्यकुल की ध्वजा श्रीरामजी सदा मेरी रक्षा करें।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।

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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन