निर्गुण सगुण विषम सम रूपं

चौपाई ६, दोहा ११ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं॥ अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं॥ ६ ॥

अर्थ

हे निर्गुण, सगुण, विषम और सम रूप! हे ज्ञान, वाणी और इन्द्रियों से अतीत! हे अनुपम, निर्मल, सम्पूर्ण दोषरहित, अनन्त एवं पृथ्वी का भार उतारनेवाले श्रीरामचन्द्रजी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।

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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन