संशय सर्प ग्रसन उरगादः

चौपाई ५, दोहा ११ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः॥ भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः॥ ५ ॥

अर्थ

जो संशयरूपी सर्प को ग्रसने के लिये गरुड़ हैं, अत्यन्त कठोर तर्क से उत्पन्न होनेवाले विषाद का नाश करनेवाले हैं, आवागमन को मिटानेवाले और देवताओं के समूह को आनन्द देनेवाले हैं, वे कृपा के वरूथ श्रीरामजी सदा हमारी रक्षा करें।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सुतीक्ष्ण की भक्ति, अगस्त्य मुनि से संवाद, दंडक वन प्रवेश और जटायु मिलन का वर्णन है।

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अगस्त्य मिलन और जटायु मिलन