बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ

चौपाई २, दोहा ११४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ॥ जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं॥ २ ॥

अर्थ

तुम उन सबको भी बिना ही परिश्रम जान जाओगे। श्रीरामजी के चरणों में तुम्हारा नित्य नया प्रेम हो। अपने मन में तुम जो कुछ इच्छा करोगे, श्रीहरि की कृपा से उसकी पूर्ति कुछ भी दुर्लभ नहीं होगी।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह