राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं
चौपाई ७, दोहा ११३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं॥ मुनि मोहि बिबिधि भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा॥ ७ ॥
अर्थ
हे तात! जिनके हृदय में श्रीरामजी की भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी भी नहीं कहना चाहिये। मुनि ने मुझे बहुत प्रकार से समझाया। तब मैंने प्रेम के साथ मुनि के चरणों में सिर नवाया।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ११३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
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लोमशजी से शाप और अनुग्रह