सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन

चौपाई १, दोहा ११३ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन॥ कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी॥ १ ॥

अर्थ

[काकभुशुण्डिजी ने कहा--] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, इसमें ऋषि का कुछ भी दोष नहीं था। रघुवंश के विभूषण श्रीरामजी ही सबके हृदय में प्रेरणा करनेवाले हैं। कृपासागर प्रभु ने मुनि की बुद्धि को भोली करके मेरे प्रेम की परीक्षा ली।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ११३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह