भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि

दोहा ११४ (ख) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥ ११४ (ख) ॥

अर्थ

मैं हठ करके भक्तिपक्ष पर अड़ा रहा, जिससे महर्षि ने मुझे शाप दिया; परन्तु उसका फल यह हुआ कि जो मुनियों को भी दुर्लभ है, वह वरदान मैंने पाया। भजन का प्रताप तो देखिये!

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का दोहा ११४ (ख) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह