गुर के बचन सुरति करि राम
गुर के बचन सुरति करि राम
दोहा ११० (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग॥ ११० (क) ॥
अर्थ
गुरुजी के वचनों का स्मरण करके मेरा मन श्रीरामजी के चरणों में लग गया। मैं क्षण-क्षण नया-नया प्रेम प्राप्त करता हुआ श्रीरघुनाथजी का यश गाता फिरता था।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का दोहा ११० (क) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
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लोमशजी से शाप और अनुग्रह