सुनि भसुंडि के बचन भवानी

चौपाई ३, दोहा ११५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी॥ तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ

[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! भुशुण्डि के वचन सुनकर गरुड़जी हर्षित होकर कोमल वाणी से बोले-हे प्रभो! आपके प्रसाद से मेरे हृदय में अब सन्देह, शोक, मोह और भ्रम कुछ भी नहीं रह गया।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह