पावन जस कि पुन्य बिनु होई
पावन जस कि पुन्य बिनु होई
चौपाई ४, दोहा ११२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई॥ लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना॥ ४ ॥
अर्थ
बिना पुण्य के क्या पवित्र यश प्राप्त हो सकता है? बिना पाप के भी क्या कोई अपयश पा सकता है? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते हैं, उस हरि-भक्ति के समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
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लोमशजी से शाप और अनुग्रह