क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि
क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि
दोहा १११ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान॥ १११ (ख) ॥
अर्थ
बिना द्वैतबुद्धि के क्रोध कैसा और बिना अज्ञान के क्या द्वैतबुद्धि हो सकती है? मायाके वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वर के समान हो सकता है ?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का दोहा १११ (ख) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
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लोमशजी से शाप और अनुग्रह