सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा

चौपाई ३, दोहा ११४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा॥ एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी॥ ३ ॥

अर्थ

हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, मुनि का आशीर्वाद सुनकर आकाश में गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई कि हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन ऐसा ही (सत्य) हो। यह कर्म, मन और वचन से मेरा भक्त है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह