बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें
चौपाई २, दोहा ११२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें॥ काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी॥ २ ॥
अर्थ
ब्राह्मण का बुरा करने से क्या वंश रह सकता है? स्वरूप की पहचान होने पर क्या [आसक्तिपूर्वक] कर्म हो सकते हैं? दुष्टों के संग से क्या किसी की सुमति उत्पन्न हुई है? परस्त्रीगामी क्या उत्तम गति पा सकता है?
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
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लोमशजी से शाप और अनुग्रह