भव कि परहिं परमात्मा बिंदक

चौपाई ३, दोहा ११२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरि निंदक॥ राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें॥ ३ ॥

अर्थ

परमात्मा को जाननेवाले क्या भव में पड़ सकते हैं? भगवान् की निन्दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है? श्रीहरि के चरित्र का बखान करने पर क्या पाप रह सकते हैं?

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह