ग्यानहि भगतिहि अंतर केता
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता
चौपाई ६, दोहा ११५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता॥ सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना॥ ६ ॥
अर्थ
हे कृपा के धाम! हे प्रभो! ज्ञान और भक्ति में कितना अन्तर है? यह सब मुझसे कहिये। गरुड़जी के वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डि जी ने सुख माना और आदर के साथ कहा--।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
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लोमशजी से शाप और अनुग्रह