मन गोतीत अमल अबिनासी

चौपाई ३, दोहा १११ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी॥ सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥ ३ ॥

अर्थ

वह मन और इन्द्रियों से परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्विकार, सीमा रहित और सुख की राशि है। वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है (तत्त्वमसि), जल और जल की लहर की भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह