सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ
चौपाई ८, दोहा १११ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ॥ अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई॥ ८ ॥
अर्थ
हे प्रभो! सुनिये, बहुत अपमान करने पर ज्ञानी के भी हृदय में क्रोध उत्पन्न हो जाता है। यदि कोई चन्दन की लकड़ी को बहुत अधिक रगड़े, तो उससे भी अग्नि प्रकट हो जायगी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ८, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
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लोमशजी से शाप और अनुग्रह