सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला

चौपाई ८, दोहा ११२ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला॥ लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई॥ ८ ॥

अर्थ

ओरे मूढ़! तेरे हृदय में अपने पक्ष का बड़ा भारी हठ है, अतः तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। मैंने आनंद के साथ मुनि के शाप को सिर पर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आई।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ८, दोहा ११२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह