जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत
जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत
दोहा ११३ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत। ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत॥ ११३ (ख) ॥
अर्थ
इतना ही नहीं, श्रीभगवान् को स्मरण करते हुए तुम जिस आश्रम में निवास करोगे वहाँ एक योजन (चार कोस) तक अविद्या (माया-मोह) नहीं व्यापेगी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का दोहा ११३ (ख) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
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लोमशजी से शाप और अनुग्रह