सुनु खगेस हरि भगति बिहाई
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई
चौपाई २, दोहा ११५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई॥ ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥ २ ॥
अर्थ
हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग श्रीहरि की भक्ति को छोड़कर दूसरे उपायों से सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड़ करनीवाले (अभागे) बिना ही जहाज के तैरकर महासमुद्र के पार जाना चाहते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
लोमशजी से शाप और अनुग्रह