गुरुजी का शिवजी से अपराध क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डि की आगे की कथा

गुरुजी शिवजी से शिष्य के अपराध की क्षमा याचना करते हैं, और शाप अंततः अनुग्रह में परिणत होता है। इसके बाद काकभुशुण्डि अपनी आध्यात्मिक यात्रा की आगे की कथा कहते हैं।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण १६ / २१

प्रकरण पाठ

श्लोक

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥ ९ ॥

अर्थ:

भगवान् रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शम्भुजी की तुष्टि के लिये ब्राह्मण द्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर भगवान् शम्भु प्रसन्न होते हैं।

दोहा

सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु। पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु॥ १०८ (क) ॥

अर्थ:

सर्वज्ञ शिवजी ने विनती सुनी और ब्राह्मण का प्रेम देखा। तब मन्दिर में आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ, वर माँगो।

दोहा

जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु। निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु॥ १०८ (ख) ॥

अर्थ:

[ब्राह्मण ने कहा--] हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और हे नाथ! यदि इस दीन पर आपका स्नेह है, तो पहले अपने चरणों की भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिये।

दोहा

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान। तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपासिंधु भगवान॥ १०८ (ग) ॥

अर्थ:

हे प्रभो! यह अज्ञानी जीव आपको माया के वश होकर निरन्तर भूला फिरता है। हे कृपा के समुद्र भगवान्! उस पर क्रोध न कीजिये।

दोहा

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल। साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल॥ १०८ (घ) ॥

अर्थ:

हे दीनों पर दया करनेवाले [कल्याणकारी] शंकर! अब इस पर कृपालु होइये (कृपा कीजिये), जिससे हे नाथ! थोड़े ही समय में इस पर शाप के बाद अनुग्रह (शाप से मुक्ति) हो जाय।

दोहा 109 के अंतर्गत
चौपाई

एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना॥ बिप्र गिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी॥ १ ॥

अर्थ:

हे कृपानिधान! अब वही कीजिये, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरे के हित से सनी हुई ब्राह्मण की वाणी सुनकर फिर आकाशवाणी हुई—'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)।

चौपाई

जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्हि कोप करि सापा॥ तदपि तुम्हारि साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी॥ २ ॥

अर्थ:

यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी इसे क्रोध कर शाप दिया है, तो भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इस पर विशेष कृपा करूँगा।

चौपाई

छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी॥ मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि॥ ३ ॥

अर्थ:

हे द्विज! जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि श्रीरामचन्द्रजी। हे द्विज! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा। यह हजार जन्म अवश्य पावेगा।

चौपाई

जनमत मरत दुसह दुख होई। एहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई॥ कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना॥ ४ ॥

अर्थ:

परन्तु जन्मने और मरने में जो दुःसह दुःख होता है, इसे वह दुःख तनिक भी नहीं व्यापेगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। हे शूद्र! मेरा प्रामाणिक (सत्य) वचन सुन।

चौपाई

रघुपति पुरीं जन्म तव भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ॥ पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें॥ ५ ॥

अर्थ:

[प्रथम तो] तेरा जन्म श्रीरघुनाथजी की पुरी में हुआ। फिर तूने मेरी सेवा में मन लगाया। पुरी के प्रभाव और मेरी कृपा से तेरे हृदय में रामभक्ति उत्पन्न होगी।

चौपाई

सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई॥ अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेसु संत अनंत समाना॥ ६ ॥

अर्थ:

हे भाई! अब मेरा सत्य वचन सुन। द्विजों की सेवा ही भगवान् को प्रसन्न करनेवाला व्रत है। अब कभी ब्राह्मण का अपमान न करना। संतों को अनन्त श्रीभगवान् ही के समान जानना।

चौपाई

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला॥ जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्र द्रोह पावक सो जरई॥ ७ ॥

अर्थ:

इन्द्र के वज्र, मेरे विशाल त्रिशूल, काल के दण्ड और श्रीहरि के विकराल चक्र के मारे भी जो नहीं मरता, वह विप्र-द्रोह रूपी अग्नि से जल जाता है।

चौपाई

अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥ ८ ॥

अर्थ:

ऐसा विवेक मन में रखे रहो। तुम्हारे लिए जग में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

दोहा

सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि। मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि॥ १०९ (क) ॥

अर्थ:

शिवजी के वचन सुनकर गुरुजी हर्षित होकर 'ऐसा ही हो' यह कहकर मुझे समझाकर और शिवजी के चरणों को हृदय में रखकर अपने घर गये।

दोहा

प्रेरित काल बिंधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल। पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गएँ कछु काल॥ १०९ (ख) ॥

अर्थ:

काल की प्रेरणा से मैं विन्ध्याचल में जाकर सर्प हुआ। फिर कुछ काल बीतने पर बिना ही परिश्रम के मैंने वह शरीर त्याग दिया।

दोहा

जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान। जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान॥ १०९ (ग) ॥

अर्थ:

मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था, जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहन लेता है।

दोहा

सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस। एहि बिधि धरेउँ बिबिधि तनु ग्यान न गयउ खगेस॥ १०९ (घ) ॥

अर्थ:

शिवजी ने वेद की मर्यादा की रक्षा की और मैंने क्लेश भी नहीं पाया। इस प्रकार हे पक्षिराज! मैंने बहुत-से शरीर धारण किये, पर मेरा ज्ञान नहीं गया।

दोहा 110 के अंतर्गत
चौपाई

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरऊँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ॥ एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

तिर्यक्‌ योनि (पशु-पक्षी), देवता या मनुष्य का, जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ (उस-उस शरीर में) मैं श्रीरामजी का भजन जारी रखता। [इस प्रकार मैं सुखी हो गया] परन्तु एक शूल मुझे बना रहा। गुरुजी का कोमल, सुशील स्वभाव मुझे कभी नहीं भूलता (अर्थात्‌ मैंने ऐसे कोमल-स्वभाव, दयालु गुरु का अपमान किया, यह दुःख मुझे सदा बना रहा)।

चौपाई

चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई॥ खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला॥ २ ॥

अर्थ:

मैंने अन्तिम शरीर ब्राह्मण का पाया, जिसे पुराण और श्रुति देवताओं को भी दुर्लभ बताते हैं। मैं वहाँ (ब्राह्मण-शरीर में) भी बालकों में मिलकर खेलता तो श्रीरघुनाथजी की ही सब लीलाएँ किया करता।

चौपाई

प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा॥ मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी॥ ३ ॥

अर्थ:

सयाना होने पर पिताजी मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और गुनता, पर मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। मेरे मन से सारी वासनाएँ भाग गयीं। केवल श्रीरामजी के चरणों में लव लग गयी।

चौपाई

कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी॥ प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे गरुड़जी! कहिये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनु को छोड़कर गदही की सेवा करेगा ? प्रेम में मग्न रहने के कारण मुझे कुछ भी नहीं सुहाता। पिताजी पढ़ा-पढ़ाकर हार गये।

चौपाई

भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता॥ जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ॥ ५ ॥

अर्थ:

जब पिता-माता कालवश हो गये (मर गये), तब मैं भक्तों की रक्षा करनेवाले श्रीरामजी का भजन करने के लिये वन में चला गया। वन में जहाँ-जहाँ मुनीश्वरों के आश्रम पाता, वहाँ-वहाँ जा- जाकर उन्हें सिर नवाता।

चौपाई

बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा॥ सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा॥ ६ ॥

अर्थ:

हे गरुड़जी! उनसे मैं श्रीरामजी के गुणों की कथाएँ पूछता। वे कहते और मैं हर्षित होकर सुनता। इस प्रकार मैं सदा-सर्वदा श्रीहरि के गुणानुवाद सुनता फिरता। शिवजी की कृपा से मेरी सर्वत्र अबाधित गति थी (अर्थात्‌ मैं जहाँ चाहता वहीं जा सकता था)।

चौपाई

छूटी त्रिबिधि ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी॥ राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं॥ ७ ॥

अर्थ:

मेरी तीनों प्रकार की (पुत्र की, धन की और मान की) गहरी प्रबल वासनाएँ छूट गयीं और हृदय में एक यही लालसा अत्यन्त बढ़ गयी कि जब श्रीरामजी के चरणकमलों के दर्शन करूँ तब अपना जन्म सफल हुआ समझूँ।

चौपाई

जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई॥ निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई॥ ८ ॥

अर्थ:

जिनसे मैं पूछता, वे ही मुनि ऐसा कहते कि ईश्वर सर्वभूतमय है। यह निर्गुण मत मुझे नहीं सुहाता था। हृदय में सगुण ब्रह्म पर प्रीति बढ़ रही थी।