गुरुजी का शिवजी से अपराध क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डि की आगे की कथा
गुरुजी शिवजी से शिष्य के अपराध की क्षमा याचना करते हैं, और शाप अंततः अनुग्रह में परिणत होता है। इसके बाद काकभुशुण्डि अपनी आध्यात्मिक यात्रा की आगे की कथा कहते हैं।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण १६ / २१
प्रकरण पाठ
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरऊँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ॥ एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ॥ १ ॥
अर्थ:
तिर्यक् योनि (पशु-पक्षी), देवता या मनुष्य का, जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ (उस-उस शरीर में) मैं श्रीरामजी का भजन जारी रखता। [इस प्रकार मैं सुखी हो गया] परन्तु एक शूल मुझे बना रहा। गुरुजी का कोमल, सुशील स्वभाव मुझे कभी नहीं भूलता (अर्थात् मैंने ऐसे कोमल-स्वभाव, दयालु गुरु का अपमान किया, यह दुःख मुझे सदा बना रहा)।
चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई॥ खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला॥ २ ॥
अर्थ:
मैंने अन्तिम शरीर ब्राह्मण का पाया, जिसे पुराण और श्रुति देवताओं को भी दुर्लभ बताते हैं। मैं वहाँ (ब्राह्मण-शरीर में) भी बालकों में मिलकर खेलता तो श्रीरघुनाथजी की ही सब लीलाएँ किया करता।
भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता॥ जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ॥ ५ ॥
अर्थ:
जब पिता-माता कालवश हो गये (मर गये), तब मैं भक्तों की रक्षा करनेवाले श्रीरामजी का भजन करने के लिये वन में चला गया। वन में जहाँ-जहाँ मुनीश्वरों के आश्रम पाता, वहाँ-वहाँ जा- जाकर उन्हें सिर नवाता।
बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा॥ सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा॥ ६ ॥
अर्थ:
हे गरुड़जी! उनसे मैं श्रीरामजी के गुणों की कथाएँ पूछता। वे कहते और मैं हर्षित होकर सुनता। इस प्रकार मैं सदा-सर्वदा श्रीहरि के गुणानुवाद सुनता फिरता। शिवजी की कृपा से मेरी सर्वत्र अबाधित गति थी (अर्थात् मैं जहाँ चाहता वहीं जा सकता था)।
छूटी त्रिबिधि ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी॥ राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं॥ ७ ॥
अर्थ:
मेरी तीनों प्रकार की (पुत्र की, धन की और मान की) गहरी प्रबल वासनाएँ छूट गयीं और हृदय में एक यही लालसा अत्यन्त बढ़ गयी कि जब श्रीरामजी के चरणकमलों के दर्शन करूँ तब अपना जन्म सफल हुआ समझूँ।