तब तब जाइ राम पुर रहऊँ

चौपाई ७, दोहा ११४ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ॥ पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा॥ ७ ॥

अर्थ

तब-तब मैं जाकर श्रीरामजी की नगरी में रहता हूँ और प्रभु की शिशुलीला देखकर सुख प्राप्त करता हूँ। फिर हे पक्षिराज! श्रीरामजी के शिशुरूप को हृदय में रखकर मैं अपने आश्रम में आ जाता हूँ।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “लोमशजी से शाप और अनुग्रह” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ११४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डिजी को लोमश मुनि द्वारा शाप और अनुग्रह मिलने तथा रामभक्ति दृढ़ होने का वर्णन है।

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लोमशजी से शाप और अनुग्रह