प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई

चौपाई ३, दोहा ५२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई॥ सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी॥ ३ ॥

अर्थ

उनका प्रेम और महान् आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगाल ने कुबेर का पद पा लिया हो। बड़े आदर के साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं--।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।

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राम-कौसल्या संवाद