धरि धीरजु सुत बदनु निहारी
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी
चौपाई ३, दोहा ५४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी॥ तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे॥ ३ ॥
अर्थ
धीरज धरकर, पुत्र का मुख देखकर माता गद्गद वचन कहने लगीं--हे तात! तुम तो पिताजी के प्राणों के समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रों को देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम-कौसल्या संवाद