तात जाउँ बलि बेगि नहाहू
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू
चौपाई १, दोहा ५३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥ पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ॥ १ ॥
अर्थ
हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिता के पास जाना। बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम-कौसल्या संवाद