दीन्हि असीस सासु मृदु बानी
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी
चौपाई १, दोहा ५८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी॥ बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता॥ १ ॥
अर्थ
सास ने कोमल वाणी से आशीर्वाद दिया। वे सीताजी को अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं। रूप की राशि और पति प्रेम में पवित्र सीताजी नीचा मुख किये बैठी सोच रही हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम-कौसल्या संवाद