राखि न सकइ न कहि सक
राखि न सकइ न कहि सक
चौपाई १, दोहा ५५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू॥ लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू॥ १ ॥
अर्थ
न रख ही सकती हैं, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही प्रकार से हृदय में बड़ा भारी संताप हो रहा है। [मन में सोचती हैं कि देखो--] विधाता की चाल सदा सब के लिये टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया राहु !।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।
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राम-कौसल्या संवाद