पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के

चौपाई ४, दोहा ५६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के॥ ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ॥ ४ ॥

अर्थ

हे पुत्र! तुम सभी के परम प्रिय हो। प्राणों के प्राण और जीवन के जीवन हो। वही (प्राणाधार) तुम कहते हो कि माता! मैं वन को जाऊँ और मैं तुम्हारे वचनों को सुनकर बैठी पछताऊँ।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।

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राम-कौसल्या संवाद