मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई
चौपाई १, दोहा ५९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई॥ नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानकिहिं लाई॥ १ ॥
अर्थ
फिर मैंने रूप की राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रवधू पायी है। मैंने इन्हें आँखों की पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण जानकी में लगा रखे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-कौसल्या संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा माता कौसल्या को वनवास का समाचार और धर्म का उपदेश का वर्णन है।
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राम-कौसल्या संवाद